शनिवार, 13 जून 2015

सम्राट विक्रमादित्य जिनके नाम पर आज भी सम्वत चल रहा है

अनुश्रुत विक्रमादित्य ईसवी पूर्व 102 से ईसवी 15 तक उज्जैन (भारत) के राजा रहे।वे ज्ञान, वीरता और उदारशीलता की व्यक्तित्व-त्रयी थे। देवभाषा (संस्कृत) हो या भारतीय अन्य भाषाएँ, दादी-नानी के किस्से-कहानियां हों या किस्सागोई की अबूझ-पहेलियाँ, चारण-भाटों की बखानी बिरादावालियाँ हों या वाक्यानाविशों की गढ़ी इबारतें, कालपात्र हों या कीर्ति-स्तम्भ-सम्राट विक्रमादित्य की भूरी-भूरी प्रशंसा करते नहीं अघाते।
सूबेदार भगवानदीन सिंह सोमवंशी के अनुसार— मालवा का प्रसिध्द राजा गंधर्वसेन था.इसके तीन पुत्रों में शंख अल्पायु में ही मर गया,भरथरी योगी हो गया और विक्रमादित्य गद्दी पर बैठा। कथा–सरित्सागर के अनुसार वे, परमार वंश के राजा महेंद्रदित्य के पुत्र थे।
{{विक्रम का वंश-परिचय
वंश—सूर्य वंश
शाखा—परमार
गौत्र-वसिष्ठ
प्रवर-वसिष्ठ, अत्रि, सांकृति
वेद-यजुर्वेद
सूत्र-पारस्कर गृह्यसूत्र
कुलदेवी-कालिका
वृक्ष-पीपल
प्रमुख गद्दी-उज्जैन}}
सम्राट विक्रमादित्य युद्ध-कला एवम शस्त्र-संचालन में निष्णात थे। उनका सम्पूर्ण संघर्षों से भरे अध्यवसायी जीवन विदेशी आक्रान्ताओं, विशेषकर शकों के प्रतिरोध में व्यतीत हुआ। अंततः ईसा पूर्व 56 में उन्होंने शकों को परास्त किया, शकों पर विजय के कारण वे ‘शकारि’ कहलाये। और इस तरह ‘विक्रम-युग’ अथवा ‘विक्रम-सम्वत’ की शुरुआत हुई। आज भी भारत और नेपाल की विस्तृत हिन्दू परम्परा में यह पंचांग व्यापक रूप से प्रयुक्त होता है। विक्रमादित्य के शौर्य का वर्णन करते हुए समकालीन अबुलगाजी लिखता है— जहाँ परमार विक्रम का दल आक्रमण करता था वहाँ शत्रुओं की लाशों के ढेर लग जाते थे और शत्रुदल मैदान छोड़कर भाग जाते।
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की राजधानी उज्जैन थी। पुराणों एवम अन्य इतिहास ग्रंथों से पता चलता है कि अरब और मिश्र भी विक्रमादित्य के अधीन थे। विक्रमादित्य की अरब-विजय का वर्णन कवि जरहम किनतोई की पुस्तक सायर-उल-ओकुल में है। तुर्की की इस्ताम्बुल शहर की प्रसिध्द लाइब्रेरी मकतब-ए-सुल्तानिया में यह ऐतिहासिक ग्रन्थ है, उसमें राजा विक्रमादित्य से संबंधित एक शिलालेख का उल्लेख है। जिसमें कहा गया है–
वे लोग भाग्यशाली है जो उस समय जन्मे और राजा विक्रम केराज्य में जीवन व्यतीत किया। वह बहुत दयालु, उदार और कर्तव्यनिष्ठ शासक था,जो हरेक व्यक्ति के बारे में सोचता था। उसने अपने पवित्र धर्म को हमारे बीच में फैलाया। अपने देश के सूर्य से भी तेज विव्दानों को इस देश में भेजा ताकि शिक्षा का उजाला फ़ैल सके। इन विव्दानों और ज्ञाताओं ने हमें भगवान की उपस्थिति और सत्य के सही मार्ग के बारे में बताकर एक परोपकार किया है। ये  विक्रमादित्य के निर्देश पर यहाँ आये।
यह शिलालेख हजरत मुहम्मद के जन्म के 165 वर्ष पहले का है।
विक्रमादित्य का प्रशस्ति-गान करती दो पुस्तकें आम प्रचलन में हैं-
1.बेताल पच्चीसी (बेताल पञ्चविंशति) इसमें पच्चीस कहानियाँ हैं। जब विक्रमादित्य विजित बेताल को कंधे पर लाद कर ले जाने लगे तो बेताल उन्हें एक समस्यामूलक कहानी सुनाता है। शर्त रहती है कि उसका समाधान जानते हुए भी यदि राजा नहीं बताएँगे तो उनके सिर के टुकडे-टुकडे हो जायेंगे और यदि राजा बोला तो बेताल मुक्त हो कर पेड़ पर लटक जावेगा। राजा ज्ञानवान थे, बुध्दिमान थे, वे समस्या का सटीक समाधान जानते थे। कहानियों का सिलसिला यूँ ही, चलता रहता है।
2.सिंहासन बत्तीसी(सिंहासन द्वात्रिंशिका) परवर्ती राजा भोज परमार को 32 पुतलियों से जड़ा स्वर्ण-सिंहासन प्राप्त हुआ। जब वे उस  पर  बैठने लगे तो उनमे से एक-एक कर पुतलियों ने साकार होकर सम्राट विक्रमादित्य की न्यायप्रियता, प्रजावत्सलता,वीरता से भरी कहानियाँ सुनाई और शर्त रखी कि यदि वे (राजा भोज) पूर्वज विक्रमादित्य के समकक्ष हैं, तभी उस सिंहासन की उत्तराधिकारी होगें! एम.आई.राजस्वी की पुस्तक राजा विक्रमादित्य के अनुसार, विक्रमादित्य को यह सिंहासन देवराज इंद्र ने दिया, जिसमें स्वर्ग की 32 शापित अप्सराएँ पुतलियाँ बनकर स्थित थीं, जिन्होंने अत्यंत निकट से देखी थी विक्रमादित्य की न्यायप्रियता।
सम्राट विक्रमादित्य का सम्बन्ध बड़ी ही आसानी से ऐसी घटना या स्मारक से जोड़ दिया जाता है, जिसका ऐतिहासिक विवरण अज्ञात है। जैसे कि, एक बार एक तांत्रिक अष्ट सिध्दियों को प्राप्त करने के लिए सर्वगुण संपन्न विक्रमादित्य की बलि देना चाहता था। वह तो भला हो बेताल का, जिसने विक्रमादित्य की न्यायप्रियता से उसे सत्य रहस्य बता दिया। बेताल का यह स्वार्थ रहा कि तांत्रिक के मरते ही वह भी मुक्त हो जायेगा। राजा विक्रमादित्य ने युक्ति से काम लिया और तांत्रिक का सिर काटकर यज्ञाग्नि के हवाले कर दिया- और राजा को अष्ट-सिध्दियां प्राप्त हो गयीं।
विक्रमादित्य स्वयं गुणी थे और विव्दानों, कवियों, कलाकारों के आश्रयदाता थे। उनके दरबार में नौ प्रसिध्द विव्दान- धन्वन्तरी, क्षपनक, अमरसिंह, शंकु, खटकरपारा, कालिदास, बेतालभट्ट वररूचि और वाराहमिहिर थे, जो नवरत्न कहलाते थे। राजा इन्हीं की सलाह से राज्य का संचालन करते थे। भविष्य-पुराण में आया है—
धन्वन्तरिः क्षपनकोमरसिंह शंकू बेतालभट्ट घटकर्पर कालिदासः.
ख्यातो वराहमिहिरो नृपते सम्भायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य।
धन्वन्तरी औषधिविज्ञान के ज्ञाता रहे,कवि कालिदास राजा के मंत्री रहे और वराह्महिर ज्योतिषविज्ञानी। उज्जैन तत्कालीन ग्रीनविच थी, जहाँ से मध्यान्ह की गणना की जाती थी। सम्राट वैष्णव थे पर शैव एवम शाक्त मतों को भी भरपूर समर्थन मिला। तब, संस्कृत सामान्य बोल-चाल की भाषा रही।
विक्रमादित्य के समय में प्रजा देहिक, देविक और भौतिक कष्टों से मुक्त थी। चीनी यात्री फाहियान लिखता है– देश की जलवायु सम और एकरूप है। जनसँख्या अधिक है और लोग सुखी हैं। राजधानी उज्जैन की शोभा का वर्णन करते हुए कवि कालिदास ने लिखा है —यह नगर स्वर्ण का एक कांतिमय खंड था, जिसका उपभोग करने के लिए उत्कृष्ट आचरण वाले देवता अपने अवशिष्ट पुण्यों के प्रताप के कारण स्वर्ग त्याग कर पृथ्वी पर उतर आये थे।
इतिहास में ऐसे अन्य राजाओं और सम्राटों की चर्चा आती है, जिन्हें विक्रमादित्य का विरुद (टाइटल) लगा या लगाया गया, जिनमें उल्लेखनीय हैं गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य और हेमचन्द्र विक्रमादित्य (जो हेमू के नाम से प्रसिध्द है)। परन्तु जिन विक्रमादित्य का हम गुणगान कर रहे हैं, वे भारत-भारती (मैथली शरण गुप्त) के अनुसार-【विक्रम कि जिनका आज भी संवत यहाँ पर चल रहा,
ध्रुव-धर्म के ऐसे नृपों का उस समय भी बल रहा।
नर रूप रत्नों से सजी थी वीर विक्रम की सभा,
अब भी जगत में जागती है जगमयी जिनकी प्रभा।
जाकर सुनो उज्जैन मानो,आज भी यह कह रही,
मैं मिट गई पर कीर्ति मेरी तब मिटेगी जब मही।】

Surendrasingh parmar

शुक्रवार, 27 मार्च 2015

राजाधिराज वंदनीय श्री जगदेव परमार

जगदैव परमार
1-जगदैव पवॉर कै पिता का नाम उदयादित्य था और राजा भौज उसकै पितृव्य थै
2-शिव की आराधना पर उदयादित्य कै यहॉ पर जगदैव का जन्म हुई था
3-इसी कारण सै जगदैव कौ महिपति कहता है
4-यौग्य हौतै हुए भी जगदैव नै पिता कै दैहान्त कै बाद अपनै बडै भाई कै लियै सिहासन का त्याग किया
5-कुन्तल नरैश नै जगदैव कौ अपनै पास रखा और पुर्ण रूप सै सम्मानित रखा
6-जगदैव नैआंध्रप्रदैश,चक्रदुर्ग नरैश ,दौरसमुद्र नरैश मलहर,गुजर्र नरैश जयसिंह एंव कर्ण पर विजय प्राप्त की
7-सिध्दराज जयसिंह कै पास पाठण जाकर उसकी राज्य सैवा मे रह जाता है ,जयसिंह कि पुत्री सै जगदैव का विवाह हौ जाता है 8-जगदैव त्याग कै बल सै जयसिंह की आयु वृध्दि करता है
9-कंकाली कौ शिशदान कर दान वीर कहलायै
10-जगदैव नै अपनै बल सै पाटण कि रक्षा की
11-जगदैव कि माता सौलकी कुल सै थी
12-जगदैव कि प्रथम रानी टौंक कै चावडा शासक राजा राजजी कि पुत्री वीरमति सै हुई
13-कंकाली कै पुत्र कालीया राक्षस कै कान काटै
14-जगदैव सा वीर व दानी जग मै कौई नही
15-राजा जगदैव नै ही कहा था-धारा भीतर मै बसूं , मौ भीतर है धार!
जौ मै चलु पिठ दै ,तौ लाजै जात पवॉर!!

सकलित-जगदैव परमार  री वात
लैखक- डॉ. महावीर सिहं गहलौत

रविवार, 1 मार्च 2015

परमार सम्राट महाराजा भोज

जब सृष्टि नहीं थी,धरती नहीं थी,जीवन नहीं था,
प्रकाश नहीं था,न जल था,न थल तब भी एक
ओज व्याप्त था | इसी ओज से सृष्टि ने आकार
लिया और यही प्राणियों के सृजन का सूत्र है |
समस्त भारत के ओज और गौरव का प्रतिबिम्ब
हैं राजा भोज | ये महानायक भारत कि संस्कृति
में,साहित्य में,लोक-जीवन में,भाषा में और जीवन
के प्रत्येक अंग और रंग में विद्यमान हैं ये
वास्तुविद्या और भोजपुरी भाषा और संस्कृति के
जनक हैं |

लोक-मानस में लोकप्रिय भोज से भोजदेव बने
जन-नायक राजा भोज का क्रुतित्व,अतुल्य वैभव
है | 965 इसवी में मालवा प्रदेश कि ऐतिहासिक
नगरी उज्जैनी में परमार वंश के राजा मुंज के
अनुज सिन्धुराज के घर इनका जन्म हुआ |

वररूचि ने घोषणा कि यह बालक 55 वर्ष 7
माह गौड़-बंगाल सहित दक्षिण देश तक राज
करेगा | पूर्व में महाराजा विक्रमादित्य के शौर्य
और पराक्रम से समृद्ध उज्जैन नगरी में पांच
वर्ष की आयु से भोज का विद्या अध्ययन
आरम्भ हुआ इसी पावस धरती पर कृष्ण,
बलराम और सुदामा ने भी शिक्षा पायी थी |
बालक भोज के मेधावी प्रताप से गुरुकुल
दमकने लगा | भोज कि अद्भुत प्रतिभा को
देख गुरुजन विस्मित थे | मात्र आठ वर्ष कि
आयु में एक विलक्षण बालक ने समस्त
विद्या,कला और आयुर्विज्ञान का ज्ञान प्राप्त
कर लिया | भोज कि तेजस्विता को द्देख
राजा मुंज का ह्रदय काँप उठा | सत्ता कि
लालसा में वाग्पति मुंज भ्रमित हो गए और
उन्होंने भोज कि हत्या का आदेश दे दिया |
भला भविष्य के सत्य को खड़ा होने से कौन
रोक सकता है !?!
काल कि प्रेरणा से मंत्री वत्सराज और चंडाल
ने बालक भोज को बचा कर सुरक्षित स्थान
पर पहुंचा दिया | महाराज मुंज के दरबार में
भोज का कृत्रिम शीश और लिखा पत्र प्रस्तुत
किया गया | पत्र पढ़ते ही मुंज का ह्रदय
जागा, वे स्वयं को धिक्कारने लगे,पुत्र-घात
कि ग्लानी में आत्मघात करने को आतुर हो
उठे तभी क्षमा-याचना के साथ मंत्री वत्सराज
ने भोज के जीवित होने कि सूचना दी | अपने
चाचा कि विचलित अवस्था देख भोज उनके
गले लग गए | महाराज मुंज ने अपने योग्य
राजकुमार को युवराज घोषित कर दिया | इसी
जयघोष के बीच महाराज मुंज ने कर्णत के
राजा तिलक के साथ युद्ध कि योजना बनायीं
और युद्ध अभियान पर चल दिए | 999 इसवी
में परमार वंश के इतिहास ने कर्वट ली |
महाराज मुंज युवराज कि घोषणा करके गए
तो वापस नहीं आये | गोदावरी नदी को पार
करने का परिणाम घातक रहा,महाराज मुंज
को जान गवानी पड़ी |

युवराज भोज महाराजाधिराज बन गए मगर
अभी वे राजपाठ सँभालने को तैयार नहीं थे |
भोज ने अपने पिता सिन्धुराज को समस्त
राजकीय-अधिकार सौंप दिए और वाग्देवी कि
साधना में तल्लीन हो गए | पिता सिन्धुराज,
गुजरात के चालुक्यों से युद्ध के लिए चल दिए
और भोज के रचना-कर्म ने आकर लेना शुरू
किया | भोजराज ने काव्य,चम्पू,कथा,कोष,
व्याकरण,निति,काव्य-शास्त्र,धर्म-शास्त्र,वास्तु-
शास्त्र,ज्योतिष,आयुर्वेद,अश्व-शास्त्र,पशु-विज्ञानं,
तंत्र,दर्शन,पूजा-पद्धति,यंत्र-विज्ञानं पर अद्भुत
ग्रन्थ लिखे | मात्र एक रात में चम्पू-रामायण
कि रचना कर समस्त विद्वानों को चकित कर
दिया,तभी परमार वंश पर एक और संकट आ
गया,महाराज सिन्धुराज रण-भूमि में वीरगति
को प्राप्त हो गए |
शूरवीर भोजराज ने शस्त्र उठा लिया,
युद्ध-अभियान छेड़ा,चालुक्यों को पिच्छे हटाया,
कोंकण को जीता | कोंकण विजय-पर्व के बाद
भोजराज का राज्याभिषेक हुआ | यह इतिहास
का दोहराव था कि ठीक इसी तरह अवंतिका
के सम्राट अशोक का राज्याभिषेक भी अनेक
विजय अभियानों के बाद ही हुआ था |
राज्याभिषेक के दिन महाकाल के वंदन और
प्रजा के अभिनन्दन से उज्जैन नगरी गूंज
उठी | विश्व-विख्यात विद्वान महाराज भोज
कि पटरानी बनाने का सौभाग्य महारानी
लीलावती को,लेकिन महाराज का अधिकाँश
समय रण-भूमि में ही बिता | विजय अभियानों
के वीरोचित-कर्मों के साथ विद्यानुरागी राजा
भोज ने अपने साहित्य-कला-संस्कारों को भी
समृद्ध किया | उनकी सभा पंद्रह कलाओं से
परिपूर्ण थी | राज्य में कालीदास,पुरंदर,धनपाल,
धनिक,चित्त्प,दामोदर,हलायुद्ध,अमित्गति,
शोभन,सागरनंदी, लक्ष्मीधरभट्ट,श्रीचन्द्र,नेमिचंद्र,
नैनंदी,सीता,विजया,रोढ़ सहित देश भर के पांच
सौ विद्वान रचनाकर्म को आकर दे रहे थे |